जगह जगह की तंग गलियों से गुजरा लोगो की मानसिकता से खुजलाया अपना सर टीलों की सफ़ेद धुप से जब हुयी दाढ़ी सफ़ेद तब जाना जिन्दगी का मतलब . परन्तु जहाँ जहाँ नानक गया था वहां खतपतवार की तरह दाढ़ी मूंछे ही क्यों पैदा हुयी नानक क्यों नहीं
TRANSLATING A POEM- A REQUEST BY KAMALA DAS जब मैं मरुँ फैंकना मत मांस और हड्डियाँ बल्कि ढेर लगा देना और उन्हें बोलने देना उनकी बदबू के जरिये , इस धरती के ऊपर जीवन का मोल क्या था , अंत में प्यार का मोल क्या था
हो सकता है तुझे बड़ा अजीब लगे , मैंने अपने नाख़ून बढ़ा लिए हैं वक़त को खुरेदना चाहता हूँ तब तक जब तक ये नज़र ना आ जाये तुम पहले दिन कैसे दिखते थे इतना उलझ गया हूँ तुझमे और तुझसे सम्बंधित चीजों में कोई हिसाब नहीं रहता बस इतना सा याद है जिस दिन नमकीन चने मिले उस दिन सोमवार होता है , तुम्हारे झूठे चमच का पास पड़े होना तुम्हारा पास बैठे होना लगता है .......................
बारिशें होती है तो घुलने लगता है आसमान भी जमीं पे , तुम ज़रा देख कर बताओ जमीं कहाँ है असमान कहाँ है .............................. तुम जून को दिसम्बर कहना मैं पतझड़ को सावन चलो आज मिलकर वक़्त को धोखा देते हैं